बच्चों पर न डालें उम्मीदों का बोझ यह एक बहुत ही विचारणीय और गंभीर विषय है। बचपन का खोता कोना यह कैसी दौड़ लगी है? एक बचपन की मासूम, अनगढ़ मिट्टी को हम शिक्षा की होड़ में जल्द ही सांचे में ढालने लगे हैं। फूलों की तरह खिलने वाले छोटे बच्चों को, जिनके दिन आंगनबाड़ी की अल्हड़ गपशप और प्ले स्कूल के खिलखिलाते खेल में बीतने चाहिए थे, उन्हें हम सीधे LKG और UKG की कक्षाओं के अनुशासन और गृहकार्य के नीचे दबा रहे हैं। आजकल, तीन-चार साल की उम्र में ही बच्चे किताबों के बस्ते का बोझ, परीक्षा की चिंता और अच्छे ग्रेड्स का तनाव महसूस करने लगते हैं। यह वह समय है जब उन्हें मिट्टी में हाथ डालने, तितलियों का पीछा करने, कहानियाँ सुनने और कल्पना की उड़ान भरने की ज़रूरत होती है। उनका दिमाग खेलने और अनुभवों से सीखने के लिए बना है, न कि अक्षर ज्ञान और अंकगणित के जबरन बोझ के लिए। जब बच्चे, खेल-खेल में सीखने की सहज प्रक्रिया से वंचित हो जाते हैं, तो उनका बचपन खो जाता है। शिक्षा ज़रूरी है, पर बचपन की कीमत पर नहीं। हमें याद रखना होगा कि एक मजबूत नींव के लिए बच्चे का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास संतुलित होना चा...
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